Friday, July 9, 2021

poetry of between the lines

करीब 16 या सत्रह वर्षों की यह कविता है।
मम स्वप्नस्तु
मोंहें -जो-दरोगृहम्।
को वसेत्तत्र?
मेरा ख्वाब तो है
मोहें जो दरो का घर,
कौन रहेगा वहाँ।
मैं बचपन से सोचता था कि कहाँ गयी मेरी ऋषि संस्कृति?कहां मैं ढूंढु कालिदास की सृष्टि? कहां है मेरी देवभाषा? जो गया है,वह सब इतिहास की बातें है। मेरे आसपास तो अलग वास्तविकता है।
सुबह में वेद की ऋषिकाओं के मंत्रों का स्मरण हो रहा था ,तब ही सिगरेट पीती महिला देखी!
मुझे याद आया की मैं अतीत के
मोंहें जो दरो में खडा हूं!

Wednesday, June 30, 2021

mono image poems 1996 30 June 21

मैने संस्कृत में मोनो इमेज की स्थापना 1978 के आसपास की।मेरे 1985 में प्रकाशित रथ्यासु जम्बूवर्णानां शिराणाम् काव्यसंग्रह में भी मोनो इमेज कविता है।उसके लक्षण 1996 में छपे प्रथम मोनो इमेज संग्रह आसीच्च मे मनसि में दिये है।